सांझ !!!!…..

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       सांझ !!!!…..
सांवली सूरत मोहनी मूरत
स्वर्ण रथ पर बैठी
पश्चिम पथ पर जाती
विहगों को हर्षाती
कलरव गीत गवाती
नीड़ों में लौटाती ……
……………………………………….
दूर क्षितिज के संधि पट पर
नीलित नभ के सुकुमार मुख पर
नित नटखट अल्हड बाला सी
लाल गुलाल मल कर छिप जाती
…………………………………………
और कहीं दीपों के कोमल उर में
मुस्कानों के पीत पुष्प खिलाती
वन उपवन धरा के छोर को
अपने श्यामल आँचल में छुपाती
…………………………………………….
कहो प्रिये !!!
फिर कब आओगी ???
कजरारी आँखों से…
मंद मंद मुस्काती …
थके पथिक को लुभाती ..
आलौकिक मंगल गीत गाती …


श्रीप्रकाश डिमरी जोशीमठ उत्तराँचल  भारत २०१०
हे प्रभु !!जीवन  के  सुहाने  दिवस  के  बाद सांझ  भी उतनी ही  सुन्दर सलोनी हो !!!
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मेरी वसुंधरा ….!!!

Earth

प्रिये !!
तुम्हारे मुझसे
रूठ जाने के बाद
सूने अनंताकाश में
तकता हूँ
सांझ के
उस झिलमिल तारे को
जो चाँद की इन्तजार में
जार जार रोते ..
कब का सो चूका है
तुम जहाँ….
सांझ का दीप जलाती थी
वहाँ खड़ा…
मुंह बाए मौन ओसारा
वहीँ ….
मिटटी में दबे आलता लगे…
तुम्हारे
कदमो के निशान
वहीँ ..
खेतों की  मेंढ पर ..
तुम्हारी
पायल सी हंसी
ओर…
सरसों के पीले फ़ूलों सा
तुम्हारा…
लकदक लहराता आँचल
साँझ सबेरे …
अब भी
पुकारते हैं तुम्हारा नाम

तुम ही…
हाँ तुम ही …
निहारिकाओं की …
सुन्दरतम नारी…..
असंख्यों स्मृतियाँ हैं
मेरी ओर तुम्हारी
आह ! प्रिये !
अवसान की इस नीरव बेला पर

तुम मुझसे क्यों रूठ गयीं ???
लिये पुष्पों के इन्द्रधनुषी हार
क्यों नहीं आई तुम..???
मेरे
ह्रदय द्वार ..
……………………………..

डबडबाई आँखों

और
डूबते दिल से
तुमसे पूछता हूँ ..


कि सदियों बाद ..
जब में लौट कर..आऊंगा
अँधेरे पहाड़ों की..
उसी घाटी से ..

जहां तुम्हारे और मेरे ..
नेह की उषा का
पहला पहला..
नारंगी सूरज खिला था…
अपनी तुतलाती आवाज में..
फिर पुकारूँगा तुम्हारा नाम !!!

तो क्या तब ..
तुम दिखाओगी मुझे ..??
वही ……………….
कोयल की अदना सी…
कूक से भरा
मुट्ठी भर जंगल
हथेली भर…..
सरसों के
मुस्कुराते पीले फूल
बच्चों की …
छेड छाड से
घूंघट में शर्माती
लाजवंती की
स्निग्ध मुस्कान

मेरी वसुन्धरे …!!!
जड़वत यूँ ….
क्यों निशब्द तुम खड़ी हो ??
अपने मधुरिम अधरों का *..

अब तो खोलो मौन ??
*आह !!!
आकाश गंगा के …
नीरव तट पर
इसका उत्तर देगा कौन ???





श्रीप्रकाश डिमरी जोशीमठ २५ सितम्बर २०११
कभी कभी  अपने  आपको जीवन  रूप  में   अस्तित्व  में आने  की  जिजीविषा  में   आकाश गंगाओं  में  लाखों प्रकाश  वर्ष  दूर ..संघर्ष रत   पाता हूँ .स्वयं  जीव  रूप  में जहाँ तक  नजर  जाती  है जीवन के  लिये  अनुकूल परिस्थितयां  प्रदान  करने  वाली   दयामयी  
हमारी पृथ्वी  निहारिकाओं  में   सबसे  सुन्दर  है ..इसको  ऐसे  ही शास्वत  सुन्दर  बनाये  रखें ..हम..
फोटो साभार गूगल 

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सभी मित्रों का हार्दिक अभिनन्दन !!!

अभिनन्दन !!!…..
शब्दों की सीमा है..
प्रेम भवसागर अनंत….
नेह की पतवार ले..
तुम आये खेवन हार ..
कुसुमित नव पल्लवित
नव पुष्प शोभित…
अनंत नेह हार ..
स्वागत हे !
प्रेम पथिक..
भावों के इस ह्रदय द्वार..
कोटि कोटि अभिनन्दन ..
शुभ कामनाएं अनंत ..
कीजिये स्वीकार ….
….श्रीप्रकाश डिमरी ….

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सभी ब्लागर मित्रों को जन्माष्ठमी पर हार्दिक शुभ कामनाएं…

lord-krishna-makhan-chor
हम  अपने आपको भगवान के अर्पित करें
यही सबसे उत्तम सहारा है।
जो इसके सहारे को जानता है
वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।…..
****वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूरमर्दनं ।
      देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुं ॥****
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प्रेम ..!!!

प्रेम !!!…………..

रात गए …
तन्हाईयों में अक्सर ..
एक चहचाहट सी सुनकर
उठ जाता हूँ विस्मित होकर ..
उस घटाटोप अंधकार में भी
तुम्हारी प्रेम पाती मुस्कुराती है ..
और मेरे ह्रदय के नीड़ से उडकर
तुम्हारी भेजी दो नन्ही चिडियाँ …
मन आंगन के अंधेरों में
आशाओं के असंख्य …
मधुर गीत सुनाती है ..
तब …..
अपने तमाम नेह को
कागज में उडेलने के
अथक प्रयास में ….
मेरी आँखों में युगों से कैद
एक हठीले ….
निश्तब्ध महासागर का मौन
एकाएक टूट जाता है ..
और निर्झर बहते अश्रुओं में
तुम्हारा ही ” प्रतिबिम्ब” मुस्कुराता है …
………………………………
( परम स्नेही मित्र प्रतिबिम्ब बर्थवाल जी के स्नेह को समर्पित )
स्वरचित….. श्रीप्रकाश डिमरी २३ मई २०१०

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प्रेम…..

प्रेम !!!…………..


रात गए …
तन्हाईयों में अक्सर ..
एक चहचाहट सी सुनकर
उठ जाता हूँ विस्मित होकर ..
उस घटाटोप अंधकार में भी
तुम्हारी प्रेम पाती मुस्कुराती है ..
और मेरे ह्रदय के नीड़ से उडकर
तुम्हारी भेजी दो नन्ही चिडियाँ …
मन आंगन के अंधेरों में
आशाओं के असंख्य …
मधुर गीत सुनाती है ..
तब …..
अपने तमाम नेह को
कागज में उडेलने के
अथक प्रयास में ….
मेरी आँखों में युगों से कैद
एक हठीले ….
निश्तब्ध महासागर का मौन
एकाएक टूट जाता है ..
और निर्झर बहते अश्रुओं में
तुम्हारा ही ” प्रतिबिम्ब” मुस्कुराता है …
………………………………
( परम स्नेही मित्र प्रतिबिम्ब बर्थवाल जी के स्नेह को समर्पित )
स्वरचित….. श्रीप्रकाश डिमरी २३ मई २०१०

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प्रकृति …..

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